दिल की ख्वाहिश को नाम क्या दूं, प्यार का उसे पैगाम क्या दूं
मिलना था इत्तेफाक बिछड़ना नसीब था,
वो इतनी दूर हो गया जितना करीब था।
एक बेनाम उदासी से भरी बैठी हूं,
आज दिल खोल के रोने की जरूरत है मुझे।
दिल की ख्वाहिश को नाम क्या दूं,
प्यार का उसे पैगाम क्या दूं।
इस दिल में दर्द नहीं यादें है उसकी,
अब यादें ही मुझे दर्द दे तो उसे इल्जाम क्या दूं।
उस वक्त याद तो बहुत आई होगी उसको मेरी,
जब उसके हाथ में किसी गैर का हाथ था।
उस वक्त मैं तो बिल्कुल अकेला था
लेकिन उसके साथ कोई था।
क्यों तुम मेरे ख्यालों में आकर चली जाती हो,
अपनी जुल्फों को बिखराकर चली जाती हो।
रगों में उमड़ आता है तूफान हुस्न का,
तुम जो फूल सा मुस्कुराकर चली जाती हो।





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